मालवा में इस साल जामुन के पेड़ों पर रिकॉर्ड संख्या में फल देखने को मिल रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों का कहना है कि पिछले कई दशकों में उन्होंने जामुनों की इतनी अधिक पैदावार नहीं देखी। जिन पेड़ों पर पिछले साल बहुत कम फल आए थे, वे भी इस बार जामुनों से लदे नजर आ रहे हैं।
इस असामान्य स्थिति ने लोगों के बीच एक पुरानी मान्यता को फिर चर्चा में ला दिया है। बुजुर्गों का मानना है कि जिस वर्ष जामुन के पेड़ों पर अत्यधिक फल लगते हैं, उस वर्ष सूखे या कड़ी गर्मी की संभावना बढ़ जाती है। दिलचस्प बात यह है कि इस पारंपरिक मान्यता को वैज्ञानिक आधार भी मिलता है।
एक्सपर्ट्स के अनुसार इस प्रक्रिया को ‘मास्टिंग’ (Masting) या स्ट्रेस फ्रूटिंग” (Stress Fruiting) कहा जाता है। जब किसी पेड़ को मिट्टी में नमी की कमी, भूजल स्तर में गिरावट या मौसम में बड़े बदलावों का आभास होता है, तब वह अपनी अधिकांश ऊर्जा नए पत्तों और शाखाओं के विकास के बजाय अधिक से अधिक फल और बीज पैदा करने में लगा देता है।
वनस्पति विज्ञान के अनुसार यह पेड़ों की एक प्राकृतिक रणनीति होती है, जिसके जरिए वे अपनी अगली पीढ़ी को सुरक्षित रखने का प्रयास करते हैं। यदि पेड़ को लगता है कि भविष्य में उसके अस्तित्व पर खतरा हो सकता है, तो वह अधिक बीज उत्पन्न करके अपनी प्रजाति को आगे बढ़ाने की कोशिश करता है।
जामुन के पेड़ों की जड़ें काफी गहराई तक जाती हैं और वे भूजल स्तर में होने वाले बदलावों को जल्दी महसूस कर सकती हैं। जब जमीन के भीतर पानी का स्तर सामान्य से अधिक नीचे चला जाता है, तब पेड़ पर तनाव बढ़ता है और वह असाधारण मात्रा में फल देने लगता है। यही कारण है कि कई वैज्ञानिक इसे संभावित सूखे या लंबे शुष्क मौसम का शुरुआती संकेत भी मानते हैं।