Dr. Syama Prasad Mukherjees Martyrdom Day: भारतीय राजनीति में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने देश की एकता, अखंडता और वैचारिक राजनीति की एक नई नींव रखी। आज, 23 जून को उनकी पुण्यतिथि है। वे एक प्रखर शिक्षाविद्, महान बैरिस्टर और स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग मंत्री थे। उन्होंने ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे’ का नारा देकर कश्मीर को भारत का पूर्ण अंग बनाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।
1. महज 33 वर्ष की उम्र में बने सबसे युवा वाइस चांसलर
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की बुद्धिमत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे केवल 33 वर्ष की आयु में कलकत्ता (कोलकाता) विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बन गए थे। उनके कार्यकाल (1934-1938) के दौरान ही महान कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह को बंगाली भाषा में संबोधित किया था, जो उस दौर में एक बहुत बड़ा बदलाव था।
2. नेहरू कैबिनेट के पहले मंत्री, जिन्होंने खुद इस्तीफा दिया
देश आजाद होने के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अपनी पहली कैबिनेट में उद्योग और आपूर्ति मंत्री (Minister for Industry and Supply) बनाया था। हालांकि, साल 1950 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच ‘नेहरू-लियाकत समझौता’ हुआ, तो डॉ. मुखर्जी ने इसका कड़ा विरोध किया। वे पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों/ हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर चिंतित थे। नीतिगत मतभेदों के कारण उन्होंने कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया। वे आजाद भारत के पहले ऐसे मंत्री थे जिन्होंने अपने पद से इस्तीफा दिया था।
3. भारतीय जनसंघ (बीजेपी की नींव) की स्थापना
नेहरू कैबिनेट से अलग होने के बाद, डॉ. मुखर्जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहयोग से 21 अक्टूबर 1951 को ‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना की। यही जनसंघ आगे चलकर 1980 में ‘भारतीय जनता पार्टी’ (BJP) के रूप में सामने आया। आज बीजेपी उन्हें अपना मार्गदर्शक और वैचारिक संस्थापक मानती है।
‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे।’
– यह ऐतिहासिक नारा डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के विरोध में दिया था।
4. कश्मीर में प्रवेश के लिए बिना परमिट के किया सफर
1950 के दशक में जम्मू-कश्मीर जाने के लिए भारत के ही नागरिकों को एक विशेष ‘परमिट’ या अनुमति पत्र लेना पड़ता था। वहां का अपना अलग झंडा या निशान और अलग प्रधानमंत्री/ प्रधान होता था। डॉ. मुखर्जी ने इस व्यवस्था को भारत की संप्रभुता के खिलाफ माना। मई 1953 में, उन्होंने इस कानून को चुनौती देने के लिए बिना परमिट के कश्मीर में प्रवेश किया, जहां लखनपुर बॉर्डर पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
5. जेल में रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत्यु
गिरफ्तारी के बाद उन्हें श्रीनगर की एक जेल में नजरबंद रखा गया। वहां उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। 23 जून 1953 को रहस्यमयी परिस्थितियों में अस्पताल में उनका निधन हो गया। उनकी मां जोगमाया देवी और देश के कई बड़े नेताओं ने इस मौत की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की थी, लेकिन तत्कालीन सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया। उनकी यह मृत्यु आज भी भारतीय इतिहास के सबसे बड़े रहस्यों में से एक मानी जाती है।