23 जून 2016 को हुए इस ऐतिहासिक फैसले को ‘ब्रेक्जिट’ नाम दिया गया। तब 52 प्रतिशत यानी करीब 1।7 करोड़ से ज्यादा लोगों ने यूरोपीय संघ से अलग होने के पक्ष में वोट किया था। भले ही जीत का अंतर मामूली था, लेकिन इस फैसले ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज को सबसे बड़ा झटका दिया। हालांकि, इस अलगाव की कागजी कार्रवाई को पूरा होने में भी करीब पांच साल का लंबा वक्त लग गया।
ब्रेक्जिट की मुख्य वजह यूरोपीय संघ से नाराजगी और 2008 का वैश्विक आर्थिक संकट था। अलग होने के समर्थकों का दावा था कि अकेले रहने पर ब्रिटेन फिर से मजबूत होगा और अपने घरेलू मुद्दों पर ध्यान दे सकेगा। वहीं, विरोधियों ने चेतावनी दी थी कि इससे देश को भारी आर्थिक नुकसान होगा और दुनिया में उसकी साख कमजोर होगी। आज 10 साल बाद, ब्रिटेन वहीं खड़ा है जो विरोधियों ने आशंका जताई थी।
अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ा अलगाव
ब्रेक्जिट समर्थकों ने सपना दिखाया था कि यूरोपीय संघ से बाहर निकलकर ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था नए आयाम छुएगी। लेकिन कोरोना महामारी, यूक्रेन युद्ध और हाल ही में अमेरिका-इस्राएल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है।
ब्रिटेन के कारोबारियों को अब यूरोपीय देशों के साथ व्यापार करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, जबकि 27 देशों का यह समूह आज भी ब्रिटेन का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। हालांकि, ब्रिटिश सामानों पर कोई टैक्स (टैरिफ) नहीं लगाया गया है, लेकिन कस्टम के कागजी काम, बॉर्डर सर्टिफिकेट और वीजा पाबंदियों जैसी गैर-टैरिफ अड़चनों ने व्यापार को बेहद मुश्किल बना दिया है। अमेरिका के साथ जिस बड़े व्यापार समझौते का वादा ब्रेक्जिट समर्थकों ने किया था, वह भी अब तक नहीं हो पाया है।